कार्तिक मास में कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को करवा चौथ का व्रत किया जाता है। यह पर्व सुहागिन महिलाओं के लिए बेहद खास माना जाता है। इस त्योहार पर मिट्टी के बरतन यानी करवे का विशेष महत्व माना गया है। वामन पुराण और अन्य ग्रंथों में चंद्रमा की पूजा का वर्णन किया हुआ है। इसके अलावा छांदोग्य उपनिषद में भी चंद्रमा में पुरुष रूपी ब्रह्मा की उपासना का महत्व बताया गया है। चतुर्थी तिथि के देवता भगवान गणेश हैं। इसलिए इस दिन चतुर्थी देवी के साथ गणेश जी की पूजा भी की जाती है। गणेश तथा चंद्रमा का होता है पूजन करवा चौथ यानी पति की लम्बी उम्र के लिए रखा जाने वाला व्रत। छांदोग्य उपनिषद् के अनुसार चंद्रमा में पुरुष रूपी ब्रह्मा की उपासना करने से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। इस व्रत में भगवान शिव और देवी पार्वती, कार्तिकेय, गणेश तथा चंद्रमा का पूजन करना चाहिए। पूजा के बाद मिट्टी के करवे में चावल, उड़द की दाल, सुहाग की सामग्री सास अथवा सास के समकक्ष किसी सुहागिन के पांव छूकर भेंट करनी चाहिए। पत्नियों का व्रत देवताओं की जीत पौराणिक कथाओं के मुताबिक एक बार देवताओं और दानवों के युद्ध में देवताओं की हार हो रही थी। ब्रह्मदेव ने इस संकट से बचने के लिए सभी देवताओं की पत्नियों को यानी शक्तियों को व्रत रखने की सलाह दी। कार्तिक माह की चतुर्थी के दिन सभी देवताओं की पत्नियों ने व्रत रखा। व्रत करने से सभी शक्तियां एकत्र हुई। जिससे युद्ध में देवताओं की जीत हुई। यह सुन सभी देव पत्नियों ने अपना व्रत खोला। माना जाता है कि इसी दिन से करवा चौथ के व्रत की परंपरा शुरू हुई। इन पांच चीजों के बिना अधूरा है करवा चौथ व्रत 1.सरगी का उपहार: सरगी से ही करवा चौथ के व्रत का प्रारंभ माना गया है। हर सास अपनी बहू को सरगी देती है और व्रत पूरा होने का आशीर्वाद देती है। सरगी में मिठाई, फल आदि होता है, जो सूर्योदय के समय बहू व्रत से पहले खाती है, जिससे पूरे दिन उसे ऊर्जा मिलती है ताकि वह व्रत आसानी से पूरा कर सके। 2.निर्जला व्रत का विधान: करवा चौथ का व्रत निर्जला रखा जाता है, इसमें व्रत रखने वाले व्यक्ति को पूरे दिन कुछ भी खाने और पीने की मनाही होती है। जल का त्याग करना होता है। व्रती अपने कठोर व्रत से माता गौरी और भगवान शिव को प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं, ताकि उन्हें अखंड सुहाग और सुखी दाम्पत्य जीवन का आशीर्वाद मिले। 3.शिव और गौरी की पूजा: करवा चौथ के व्रत में सुबह से ही श्री गणेश, भगवान शिव और माता गौरी की पूजा की जाती है, ताकि उन्हें अखंड सौभाग्य, यश और कीर्ति मिल सके। पूजा में माता गौरी और भगवान शिव के मंत्रों का जाप किया जाता है। 4.शिव-गौरी की मिट्टी की मूर्ति: करवा चौथ में पूजा के लिए शुद्ध पीली मिट्टी से शिव, गौरी और गणेश जी की मूर्ति बनाई जाती है। फिर उन्हें चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर स्थापित किया जाता है। माता गौरी को सिंदूर, बिंदी, चुन्नी तथा भगवान शिव को चंदन, पुष्प, वस्त्र आदि पहनाते हैं। श्रीगणेशजी उनकी गोद में बैठते हैं। 5.कथा: दिन में पूजा की तैयारी के बाद शाम में महिलाएं एक जगह इकट्ठा होती हैं। वहां पंडितजी या उम्रदराज महिलाएं करवा चौथ की कथा सुनाती हैं। इसके बाद चांद के निकलने पर अर्घ्य देना चाहिए। फिर पानी पीकर अपना व्रत खोलती हैं। आज की ताज़ा ख़बरें पढ़ने के लिए दैनिक भास्कर ऍप डाउनलोड करें This fast is considered incomplete without five things including the worship of the moon and Lord Shiva-Parvati. https://ift.tt/3mSjjua Dainik Bhaskar चंद्रमा और भगवान शिव-पार्वती की पूजा सहित पांच चीजों के बिना अधूरा माना जाता है ये व्रत
कार्तिक मास में कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को करवा चौथ का व्रत किया जाता है। यह पर्व सुहागिन महिलाओं के लिए बेहद खास माना जाता है। इस त्योहार पर मिट्टी के बरतन यानी करवे का विशेष महत्व माना गया है। वामन पुराण और अन्य ग्रंथों में चंद्रमा की पूजा का वर्णन किया हुआ है। इसके अलावा छांदोग्य उपनिषद में भी चंद्रमा में पुरुष रूपी ब्रह्मा की उपासना का महत्व बताया गया है। चतुर्थी तिथि के देवता भगवान गणेश हैं। इसलिए इस दिन चतुर्थी देवी के साथ गणेश जी की पूजा भी की जाती है।
गणेश तथा चंद्रमा का होता है पूजन
करवा चौथ यानी पति की लम्बी उम्र के लिए रखा जाने वाला व्रत। छांदोग्य उपनिषद् के अनुसार चंद्रमा में पुरुष रूपी ब्रह्मा की उपासना करने से सारे पाप नष्ट हो जाते हैं। इस व्रत में भगवान शिव और देवी पार्वती, कार्तिकेय, गणेश तथा चंद्रमा का पूजन करना चाहिए। पूजा के बाद मिट्टी के करवे में चावल, उड़द की दाल, सुहाग की सामग्री सास अथवा सास के समकक्ष किसी सुहागिन के पांव छूकर भेंट करनी चाहिए।
पत्नियों का व्रत देवताओं की जीत
पौराणिक कथाओं के मुताबिक एक बार देवताओं और दानवों के युद्ध में देवताओं की हार हो रही थी। ब्रह्मदेव ने इस संकट से बचने के लिए सभी देवताओं की पत्नियों को यानी शक्तियों को व्रत रखने की सलाह दी। कार्तिक माह की चतुर्थी के दिन सभी देवताओं की पत्नियों ने व्रत रखा। व्रत करने से सभी शक्तियां एकत्र हुई। जिससे युद्ध में देवताओं की जीत हुई। यह सुन सभी देव पत्नियों ने अपना व्रत खोला। माना जाता है कि इसी दिन से करवा चौथ के व्रत की परंपरा शुरू हुई।
इन पांच चीजों के बिना अधूरा है करवा चौथ व्रत
1.सरगी का उपहार: सरगी से ही करवा चौथ के व्रत का प्रारंभ माना गया है। हर सास अपनी बहू को सरगी देती है और व्रत पूरा होने का आशीर्वाद देती है। सरगी में मिठाई, फल आदि होता है, जो सूर्योदय के समय बहू व्रत से पहले खाती है, जिससे पूरे दिन उसे ऊर्जा मिलती है ताकि वह व्रत आसानी से पूरा कर सके।
2.निर्जला व्रत का विधान: करवा चौथ का व्रत निर्जला रखा जाता है, इसमें व्रत रखने वाले व्यक्ति को पूरे दिन कुछ भी खाने और पीने की मनाही होती है। जल का त्याग करना होता है। व्रती अपने कठोर व्रत से माता गौरी और भगवान शिव को प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं, ताकि उन्हें अखंड सुहाग और सुखी दाम्पत्य जीवन का आशीर्वाद मिले।
3.शिव और गौरी की पूजा: करवा चौथ के व्रत में सुबह से ही श्री गणेश, भगवान शिव और माता गौरी की पूजा की जाती है, ताकि उन्हें अखंड सौभाग्य, यश और कीर्ति मिल सके। पूजा में माता गौरी और भगवान शिव के मंत्रों का जाप किया जाता है।
4.शिव-गौरी की मिट्टी की मूर्ति: करवा चौथ में पूजा के लिए शुद्ध पीली मिट्टी से शिव, गौरी और गणेश जी की मूर्ति बनाई जाती है। फिर उन्हें चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर स्थापित किया जाता है। माता गौरी को सिंदूर, बिंदी, चुन्नी तथा भगवान शिव को चंदन, पुष्प, वस्त्र आदि पहनाते हैं। श्रीगणेशजी उनकी गोद में बैठते हैं।
5.कथा: दिन में पूजा की तैयारी के बाद शाम में महिलाएं एक जगह इकट्ठा होती हैं। वहां पंडितजी या उम्रदराज महिलाएं करवा चौथ की कथा सुनाती हैं। इसके बाद चांद के निकलने पर अर्घ्य देना चाहिए। फिर पानी पीकर अपना व्रत खोलती हैं।
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